अंबिकापुर | छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां मातृभाषा बोलना एक मासूम बच्चे के लिए “गुनाह” बन गया। आरोप है कि अंबिकापुर स्थित सौरंग किड्स एकेडमी नामक निजी स्कूल ने सिर्फ इसलिए 4 साल के बच्चे को एडमिशन देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह सरगुजिया भाषा बोलता है।
पीड़ित अभिभावक ने स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके बच्चे ने एक सप्ताह तक डेमो क्लास अटेंड की, लेकिन बाद में स्कूल ने एडमिशन देने से साफ इनकार कर दिया। जब वजह पूछी गई तो कथित तौर पर स्कूल प्रबंधन ने कहा कि “बच्चा सरगुजिया बोलता है, इससे दूसरे बच्चे भी प्रभावित हो सकते हैं।” इस बयान ने न सिर्फ अभिभावकों को बल्कि पूरे इलाके को हैरान कर दिया है।
मामला सामने आने के बाद प्रशासन भी हरकत में आ गया है। सरगुजा कलेक्टर ने शिक्षा विभाग को जांच के निर्देश देते हुए कहा है कि पूरे मामले की गंभीरता से पड़ताल कर उचित कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार का भाषाई भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इस विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “अगर सरगुजा में सरगुजिया भाषा बोलने पर किसी बच्चे को स्कूल में एडमिशन नहीं मिलता है, तो ऐसे स्कूलों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा होता है। शिक्षा विभाग को तत्काल जांच कर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे स्कूलों को बंद कर देना चाहिए जो बच्चों के साथ भेदभाव करते हैं।”
यह मामला सिर्फ एक बच्चे का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भाषा और पहचान के सम्मान का भी है। सवाल उठ रहा है कि क्या अंग्रेजी या तथाकथित “मॉडर्न” शिक्षा के नाम पर स्थानीय भाषाओं को दबाने की कोशिश की जा रही है? क्या शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को जोड़ना है या उनकी जड़ों से काटना?
अब सभी की नजर प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी है। देखना होगा कि इस “भाषाई भेदभाव” के आरोपों पर जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं।
