विशेष रिपोर्ट: झीरम घाटी—बस्तर की वादियों में आज भी गूंजती है उस ‘खूनी शनिवार’ की चीख

विशेष रिपोर्ट: झीरम घाटी—बस्तर की वादियों में आज भी गूंजती है उस 'खूनी शनिवार' की चीख

विशेष रिपोर्ट: झीरम घाटी—बस्तर की वादियों में आज भी गूंजती है उस 'खूनी शनिवार' की चीख

रायपुर/जगदलपुर: बस्तर के घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच बसी झीरम घाटी की फिजाओं में आज भी एक अजीब सी खामोशी है। यह खामोशी सिर्फ जंगलों की नहीं, बल्कि उस अधूरे सच की है जो 13 साल बाद भी फाइलों और जांच आयोगों के बीच कहीं दफन है। 25 मई 2013 की वह शाम, छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसने सूबे की राजनीति की पूरी दिशा ही बदल दी।

परिवर्तन की लहर और मौत का बिछाया जाल

साल 2013 में विधानसभा चुनाव की आहट थी। तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल के नेतृत्व में ‘परिवर्तन रैली’ सुकमा से जगदलपुर की ओर लौट रही थी। काफिला उत्साह से लबरेज था, लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि झीरम के मोड़ पर नक्सलियों ने मौत का सबसे बड़ा अंबार सजा रखा है।

वो भयावह मंजर: गोलियों की तड़तड़ाहट और अपनों का खोना

शाम के वक्त अचानक हुए एक जोरदार धमाके ने घाटी को थर्रा दिया। इससे पहले कि कोई संभल पाता, चारों तरफ से अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई। देखते ही देखते बस्तर की धरती अपनों के लहू से लाल हो गई। इस हमले ने छत्तीसगढ़ के शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह खत्म कर दिया:

  • महेंद्र कर्मा: ‘बस्तर टाइगर’ के नाम से मशहूर नेता, जिन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ लोहा लिया था।
  • नंदकुमार पटेल: एक सौम्य चेहरा और भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में देखे जाने वाले नेता।
  • विद्याचरण शुक्ल: राजनीति के चाणक्य, जिन्होंने बाद में अस्पताल में दम तोड़ा।

इनके साथ ही दिनेश पटेल और कई जांबाज सुरक्षाकर्मियों समेत करीब 30 लोग इस कायराना हमले की भेंट चढ़ गए।

सवाल आज भी जिंदा हैं: हमला या साजिश?

इस घटना को एक दशक से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन पीड़ित परिवारों की आंखों में न्याय का इंतजार आज भी बरकरार है। प्रदेश की राजनीति में यह सवाल हमेशा तैरता रहा है कि क्या यह सिर्फ एक नक्सली हमला था या कोई ‘सुपारी किलिंग’?

“झीरम का सच सामने आना जरूरी है। यह सिर्फ एक हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार था।” — यह मांग आज भी बस्तर से रायपुर तक गूंजती है।

अधूरा न्याय और अनसुलझी पहेली

मामले की जांच NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) और कई न्यायिक आयोगों द्वारा की गई, लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच मुख्य साजिशकर्ता और पर्दे के पीछे के चेहरों तक कानून के हाथ नहीं पहुंच पाए।

झीरम घाटी कांड सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक गहरा घाव है। जब तक उस शाम की पूरी सच्चाई सामने नहीं आती, बस्तर की वादियों का सन्नाटा ऐसे ही सवाल पूछता रहेगा। न्याय की उम्मीद में बूढ़ी होती आंखें आज भी पूछ रही हैं—आखिर उस दिन असल में हुआ क्या था?

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