कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक ऐसी ‘चुनावी सुनामी’ आई है, जिसने बड़े-बड़े धुरंधरों के किलों को ढहा दिया है। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह हकीकत की जमीन पर उकेरी गई एक ऐसी इबारत है, जिसने संघर्ष और सफलता के मायने बदल दिए हैं। कभी दूसरों के घरों में ₹2,500 प्रति माह पर बर्तन मांजने और झाड़ू-पोछा करने वाली कलिता मांझी अब पश्चिम बंगाल की विधानसभा में अपनी आवाज बुलंद करेंगी।
संघर्ष की आंच में तपकर कुंदन बनीं कलिता मांझी
कलिता का सफर मखमली कालीनों वाला नहीं, बल्कि कांटों भरा रहा है। अभावों की कोख से जन्मी इस महिला ने वर्षों तक आर्थिक तंगी की मार झेली। घर का चूल्हा जलता रहे, इसके लिए उन्होंने घरेलू सहायिका के रूप में काम किया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। काम के दौरान लोगों के दुख-दर्द को करीब से देखने वाली कलिता के मन में समाज के लिए कुछ करने की ऐसी लौ जली कि उन्होंने सीधे सत्ता के गलियारों का रुख कर लिया।

न धनबल, न बाहुबल… सिर्फ जनबल का जादू!
जहाँ आज की राजनीति में करोड़ों के चुनावी फंड और तामझाम का बोलबाला है, वहीं कलिता ने सादगी को ही अपना हथियार बनाया। उनके पास न तो बड़ी गाड़ियाँ थीं और न ही कार्यकर्ताओं की भारी-भरकम फौज। उन्होंने चिलचिलाती धूप में पैदल ही घर-घर जाकर वोट मांगे।
“जब मैं उनके दरवाजों पर वोट मांगने गई, तो उन्होंने मुझे अपनी बेटी और बहू की तरह देखा। मेरी जीत उनकी उम्मीदों की जीत है।” — कलिता मांझी
जनता ने भी उनकी ईमानदारी और सादगी पर ऐसी मुहर लगाई कि विरोधियों के हौसले पस्त हो गए। भाजपा के टिकट पर उनकी यह जीत यह साबित करती है कि लोकतंत्र में ‘वोट’ की ताकत ‘नोट’ की ताकत से कहीं बड़ी है।
अब ‘मैदान’ नहीं, ‘विधानसभा’ में दिखेगा दम
एक विधायक के तौर पर कलिता मांझी के सामने अब चुनौतियों का हिमालय खड़ा है। लेकिन जिस महिला ने ₹2,500 में घर चला लिया, उसके लिए किसी भी चुनौती से निपटना नामुमकिन नहीं लगता। उनकी प्राथमिकताओं में शामिल हैं:
- शिक्षा और स्वास्थ्य: पिछड़े इलाकों में सुविधाओं को जमीनी स्तर पर पहुंचाना।
- महिला सशक्तिकरण: खुद के संघर्ष से सीख लेकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना।
- बुनियादी ढांचा: सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत समस्याओं का अंत।
सियासत के नए दौर का आगाज़
कलिता मांझी की जीत ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नया संदेश दिया है। यह जीत उन तमाम दबे-कुचले लोगों के लिए एक मशाल है, जो संसाधनों की कमी के कारण पीछे हट जाते हैं। कल्पिता ने दिखा दिया है कि यदि नीयत साफ हो और इरादे फौलादी, तो झोपड़ी का रास्ता सीधे विधानसभा तक जा सकता है।
