स्वागत की नई परंपरा: नारायणपुर में अब ‘बुके’ नहीं ‘बुक’ (Book) का कल्चर, कलेक्टर की पहल की प्रदेशभर में चर्चा।

स्वागत की नई परंपरा: नारायणपुर में अब 'बुके' नहीं 'बुक' (Book) का कल्चर, कलेक्टर की पहल की प्रदेशभर में चर्चा।

स्वागत की नई परंपरा: नारायणपुर में अब 'बुके' नहीं 'बुक' (Book) का कल्चर, कलेक्टर की पहल की प्रदेशभर में चर्चा।

नारायणपुर। प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच मानवीय संवेदनाओं की एक नई मिसाल पेश करते हुए नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने एक ऐसी अभिनव पहल शुरू की है, जिसने परंपरा और सेवा को एक नए सूत्र में पिरो दिया है। अक्सर सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों के स्वागत के लिए फूलों के गुलदस्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन अब नारायणपुर कलेक्ट्रेट का नजारा बदला-बदला सा है।

गुलदस्ता नहीं, ज्ञान की सामग्री

कलेक्टर कार्यालय के बाहर एक छोटा सा सूचना पत्र आज जिले में बड़े बदलाव का संदेश दे रहा है। इसमें स्पष्ट लिखा गया है कि:

“कलेक्टर महोदया से भेंट हेतु बुके (गुलदस्ता) के स्थान पर बच्चों के लिए उपयोगी सामग्री जैसे पेन, कॉपी आदि ला सकते हैं।”

इस पहल के पीछे कलेक्टर नम्रता जैन की सोच स्पष्ट है—स्वागत के नाम पर होने वाले अनावश्यक खर्च को बचाकर उसे सीधे जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा से जोड़ना। जहां फूल कुछ घंटों में मुरझा जाते हैं, वहीं भेंट में मिली एक कलम या कॉपी किसी बच्चे के भविष्य को संवारने में मददगार साबित हो रही है।

समाज में उत्साह और सराहना

कलेक्टर की इस सादगी और संवेदनशीलता का असर भी दिखने लगा है। अब कलेक्ट्रेट पहुंचने वाले लोग फूलों के बजाय हाथों में शैक्षणिक सामग्री लेकर पहुंच रहे हैं। जिले के युवाओं और सामाजिक संगठनों ने इस कदम को ‘शिक्षा क्रांति’ की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है। आम नागरिकों का मानना है कि यदि अन्य अधिकारी भी इस सोच को अपनाएं, तो समाज में एक सकारात्मक बदलाव की लहर दौड़ सकती है।

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