भगवत शरण माथुर के जयंती अवसर पर भक्ति और श्रद्धा का हुआ संगम

भगवत शरण माथुर के जयंती अवसर पर भक्ति और श्रद्धा का हुआ संगम

भगवत शरण माथुर के जयंती अवसर पर भक्ति और श्रद्धा का हुआ संगम

बाल कथावाचक ने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए बांधा भक्ति का समा

अमरकंटक/अनूपपुर। मध्यप्रदेश के अमरकंटक में श्री नर्मदे हर सेवा न्यास के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय भगवत शरण माथुर जी की जयंती के अवसर पर भक्ति और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। इस अवसर पर ‘पंच परिवर्तन’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य रूप से शामिल हुए। पूरे क्षेत्र में इस आयोजन को लेकर भारी उत्साह और भक्तिमय माहौल रहा।

मुख्यमंत्री के इंतज़ार में बाल कथावाचक ने मोहा मन

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण कोयलांचल क्षेत्र गोविंदा (जमुना-कोतमा) की प्रसिद्ध 12 वर्षीय बाल कथावाचक और भजन गायिका उन्नति मिश्रा की प्रस्तुति रही। मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व लगभग तीन घंटे तक चले सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम में उन्नति ने अपने मधुर भजनों और ओजस्वी विचारों (मोटिवेशनल स्पीच) से उपस्थित जनसमूह को पूरी तरह से भावविभोर कर दिया।

“व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा होता है”

बाल कथावाचक उन्नति किशोरी ने स्व. भगवत शरण माथुर जी की जीवन शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज का यह कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार-यज्ञ है। उन्होंने मुख्यमंत्री का स्वागत करते हुए कहा कि जब सत्ता और संस्कार एक साथ चलते हैं, तभी राष्ट्र का उत्थान संभव है।

माथुर जी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्नति ने कहा, “भगवत शरण माथुर जी एक व्यक्ति नहीं, एक चेतना हैं। वे राष्ट्रधर्म की जीवंत व्याख्या थे। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि सुविधा नहीं, समर्पण महान होता है और व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा होता है।” उन्होंने माथुर जी के त्याग, तपस्या और अनुशासन को आज के भटकते समाज के लिए दिशा-सूचक दीपस्तंभ बताया।

राष्ट्र निर्माण का शास्त्र है ‘पंच परिवर्तन’

अपने संबोधन में उन्नति मिश्रा ने गोष्ठी के मुख्य विषय ‘पंच परिवर्तन’ को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह कोई सरकारी योजना या मंचीय नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र पुनर्निर्माण का शास्त्र है। उन्होंने पंच परिवर्तन के सूत्रों को विस्तार से समझाया:

  • स्वभाव परिवर्तन: जब तक व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मकता, अहंकार और स्वार्थ को नहीं छोड़ेगा, परिवर्तन संभव नहीं।
  • परिवार परिवर्तन: परिवार केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है।
  • समाज परिवर्तन: जाति, वर्ग और भाषा के नाम पर बंटा समाज सशक्त नहीं हो सकता, हमें समरसता लानी होगी।
  • राष्ट्र परिवर्तन: ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का भाव जब तक हृदय में नहीं होगा, विकास केवल कागज़ों तक सीमित रहेगा।
  • विश्व परिवर्तन: भारत का दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” का है, हम पूरे विश्व के कल्याण के लिए जीते हैं।

समाज को चरित्र निर्माण का संदेश

उन्नति ने समाज के वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज साधन बढ़ रहे हैं लेकिन साधना घट रही है; जानकारी बढ़ रही है लेकिन विवेक कम हो रहा है; और भीड़ बढ़ रही है लेकिन चरित्र खो रहा है। ऐसे में राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं, चरित्र से होता है।

उन्होंने उपस्थित लोगों से आह्वान किया कि वे केवल भाषण न सुनें, बल्कि स्वयं को बदलने, परिवार को संस्कारित करने और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का संकल्प लें। उनके इन ओजस्वी और मार्मिक शब्दों ने सभा में उपस्थित हर एक श्रोता के हृदय को छू लिया और पूरा वातावरण तालियों व जयकारों से गूंज उठा।

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