साहित्यिक संगम: बैकुंठपुर में CEO आशुतोष चतुर्वेदी की कृति “यक्षिणी” के मुखपृष्ठ का गरिमामयी विमोचन

हर रोज बिखरती साँझ के साथ, बिखर जाती है जिंदगी टुकड़ों में कई…

हर रोज बिखरती साँझ के साथ, बिखर जाती है जिंदगी टुकड़ों में कई…

बैकुंठपुर (कोरिया) | जिला मुख्यालय स्थित गंगा श्री होटल में बीते दिनों साहित्य, संवेदना और सृजन का एक अनूठा संगम देखने को मिला। अवसर था—कोरिया जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) एवं रचनाकार आशुतोष चतुर्वेदी की कृति “यक्षिणी” के मुखपृष्ठ (Cover Page) का विमोचन। इस आयोजन ने न केवल साहित्य प्रेमियों को एकजुट किया, बल्कि प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच रचनात्मकता की जीवंत उपस्थिति भी दर्ज कराई।

प्रमुख उपस्थिति एवं गरिमा

कार्यक्रम में मुख्य रूप से कलेक्टर कोरिया श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी उपस्थित रहीं। उनकी गरिमामयी मौजूदगी के साथ-साथ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रबुद्ध साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। उपस्थित जनों ने श्री चतुर्वेदी के लेखन की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए संवेदनशील और विचारोत्तेजक बताया।

भावुक कर देने वाली साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ

विमोचन के दौरान जब रचना की कुछ पंक्तियाँ साझा की गईं, तो पूरा वातावरण भावुक हो उठा। विशेषकर इन पंक्तियों ने श्रोताओं के हृदय को गहराई से छुआ:

“हर रोज बिखरती साँझ के साथ, बिखर जाती है जिंदगी टुकड़ों में कई…”

इन शब्दों ने जीवन के संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को खूबसूरती से स्वर दिया। उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि यह कृति केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों का निचोड़ है।

साहित्यकारों का जमावड़ा

इस साहित्यिक अनुष्ठान में जिले के दिग्गज रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें मुख्य रूप से शामिल थे:

  • वरिष्ठ साहित्यकार बी.पी. मिश्रा ‘अनाम’
  • योगेश गुप्ता, रूद्र मिश्रा, वीरेंद्र श्रीवास्तव
  • सतीश उपाध्याय, संतोष जैन, रामचरित द्विवेदी
  • उत्तम कश्यप, सुनील शर्मा और मारुति शर्मा

इन सभी साहित्य मनीषियों ने अपनी सहभागिता से चर्चा को समृद्ध किया और आज के दौर में रचनात्मकता की महत्ता पर प्रकाश डाला।

एक सशक्त वैचारिक मंच

यह आयोजन मात्र एक पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने साहित्य और संस्कृति के आदान-प्रदान हेतु एक सशक्त मंच की भूमिका निभाई। कार्यक्रम के समापन पर यह स्पष्ट संदेश गया कि प्रशासनिक दायित्वों के बीच भी संवेदनाओं को जीवित रखा जा सकता है और साहित्य आज भी समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

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