आजादी के 8 दशक बाद भी अंधेरे में राजापड़ाव: ग्रामीणों ने पीएम मोदी को खून से लिखा पत्र

आजादी के 8 दशक बाद भी अंधेरे में राजापड़ाव: ग्रामीणों ने पीएम मोदी को खून से लिखा पत्र

आजादी के 8 दशक बाद भी अंधेरे में राजापड़ाव: ग्रामीणों ने पीएम मोदी को खून से लिखा पत्र

​गरियाबंद। डिजिटल इंडिया और चांद पर पहुंचने का दम भरते आधुनिक भारत में आज भी एक ऐसा इलाका है, जहां हजारों लोग बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं। स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक (79 वर्ष) बाद भी छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का राजापड़ाव क्षेत्र घने अंधेरे में डूबा हुआ है। प्रशासन की इसी बेरुखी और लगातार मिल रही उपेक्षा से तंग आकर आखिरकार ग्रामीणों का आक्रोश ‘खून से लिखी पुकार’ बनकर सामने आया है।

​ग्राम अड़गडी में आयोजित एक विशाल जनसभा के दौरान हजारों ग्रामीणों ने अपने खून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पत्र लिखकर गांवों में बिजली पहुंचाने की गुहार लगाई है।

​लालटेन और ढिबरी के सहारे कट रही रातें

​राजापड़ाव क्षेत्र के दर्जनों गांव और आश्रित पारा-टोले आज के आधुनिक युग में भी लालटेन और ढिबरी के सहारे रातें गुजारने को मजबूर हैं। जनसभा में उमड़े ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों ने “जल-जंगल-जमीन हमारा है, बिजली-पानी अधिकार हमारा है” के नारों के साथ अपनी आवाज बुलंद की।

​ग्रामीणों का दर्द है कि बिजली न होने के कारण उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार और संचार (मोबाइल-इंटरनेट) जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी तरह ठप पड़ी हैं।

​”जब पूरा देश डिजिटल हो रहा है, तब हमारे बच्चे अंधेरे में भविष्य तलाश रहे हैं। चुनाव के समय नेता आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन वोट मिलते ही हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं होता।”

— आक्रोशित ग्रामीण

​टाइगर रिजर्व और प्रशासनिक अड़चनें बनीं बाधा

​ग्रामीणों के अनुसार, यह पूरा क्षेत्र उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के दायरे में आता है। यही कारण है कि वन विभाग की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और अन्य प्रशासनिक पेचदगियां बिजली विस्तार के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई हैं। इससे पहले भी कई बार आवेदन, ज्ञापन और शांतिपूर्ण आंदोलन किए गए, लेकिन नतीजा हमेशा शून्य रहा।

मांग पूरी न होने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी

​सैकड़ों ग्रामीणों के खून से हस्ताक्षरित इस पत्र में प्रधानमंत्री से सीधे हस्तक्षेप करने और इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने की मांग की गई है। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी उनकी मांग को फाइलों में दबाया गया या केवल आश्वासन देकर छोड़ दिया गया, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।

​एक बड़ा सवाल…

​अब यह मामला सिर्फ बिजली की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्रामीण विकास और बुनियादी अधिकारों की समानता पर एक बड़ा सवालिया निशान है। देखना यह होगा कि क्या ग्रामीणों के खून से लिखी यह चीख दिल्ली के गलियारों तक पहुंचेगी और राजापड़ाव के घरों को रोशन करेगी, या फिर हमेशा की तरह आश्वासनों के अंधेरे में खो जाएगी।

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